SCFI
SCFI
Karwa Chauth » Karva Chauth Vrat Katha in Hindi

Karva Chauth Vrat Katha in Hindi

Click here for Karwa Chauth Story (in English)

हर एक त्योहार के मनाने के पीछे एक ठोस वजह और कहानी होती है| महिलाओं के द्वारा पति के कल्याण के लिए रखे जाने वाले पर्व ‘करवा चौथ’ की भी अपनी एक कहानी है, जिसे स्त्रियाँ कथा के रूप में व्रत के दिन सुनती है| वैसे तो करवा चौथ की कई कहानियां है परन्तु सबका मूल एक ही है| कहा जाता है की करवा चौथ के दिन व्रत कथा का पढ़ा जाना काफी महत्व रखता है| यह प्रथा सदियों से चली आ रही है और सभी वैवाहित महिलाएं इसका पूर्ण रूप से पालन करती है|

करवा चौथ व्रत कथा

कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ कहते है| इसमें गणेश जी का पूजन करके उन्हें पूजन दान से प्रसन्न किया जाता है, इसका विधान चैत्र की चतुर्थी में लिख दिया है| परन्तु विशेषता यह है की इसमें गेहूँ का करवा भर के पूजन किया जाता है और विवाहित लड़कियों के यहाँ चीनी के करवे पीहर से भेजे जाते है| तथा इसमें निम्नलिखित कहानी सुनकर चन्द्रोद्र्थ में अर्ध्य देकर व्रत खोला जाता है|

कथा- एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी| सेठानी के सहित उसकी बहुओं और बेटी ने करवा चौथ का व्रत रखा था| रात्रि को साहकार के लड़के भोजन करने लगे तो उन्होंने अपनी बहिन से भोजन के लिए कहा| इस पर बहिन ने जवाब दिया- भाई! अभी चाँद नहीं निकला है, उसके निकलने पर अर्ग देकर भोजन करुँगी| बहिन की बात सुनकर भाइयों ने क्या काम किया कि नगर से बाहर जा कर अग्नि जला दी और छलनी ले जाकर उसमें से प्रकाश दिखाते हुए उन्होनें बहिन से कहा-बहिन! चाँद निकल आया है अर्ग देकर भोजन कर लो| यह सुनकर उसने अपने भाभियों से कहा कि आओ तुम भी चन्द्रमा को अर्ग दे लो, परन्तु वे इस काण्ड को जानती थी, उन्होंने कहा बाई जी! अभी चाँद नहीं निकला है, तेरे भाई तेरे से धोका करते हुए अग्नि का प्रकाश छलनी से दिखा रहे है| भाभियों की बात सुनकर भी उसने कुछ ध्यान ना दिया एवं भाइयों द्वारा दिखाए गए प्रकाश को ही अर्ग देकर भोजन कर लिया| इस प्रकाश व्रत भंग करने से गणेश जी उस पर अप्रस्सन हो गए| इसके बाद उसका पति सख्त बीमार हो गया और जो कुछ घर में था उसकी बीमारी में लग गया| जब उसने अपने किये हुए दोषों का पता लगा तो उसने पश्चाताप किया गणेश जी की प्राथना करते हुए विधि विधान से पुनः चतुर्थी का व्रत करना आरम्भ कर दिया| श्रधानुसार सबका आदर करते हुए सबसे आशीर्वाद ग्रहण करने में ही मन को लगा दिया| इस प्रकाश उसके श्रद्धा भक्ति सहित कर्म को देखकर भगवान गणेश उस पर प्रसन्न हो गये और उसके पति को जीवन दान दे कर उसे आरोग्य करने के पश्चात धन-सम्पति से युक्त कर दिया| इस प्रकाश जो कोई छल-कपट को त्याग कर श्रधा-भक्ति से चतुर्थी का व्रत करेंगे वे सब प्रकार से सुखी होते हुए

गणेश जी विनायक जी की कहानी

एक अन्धी बुढिया थी जिसका एक लड़का और लड़के की बहु थी| वो बहुत गरीब था| वह अन्धी बुढिया नित्यप्रति गणेश जी की पूजा किया करती थी| गणेश जी साक्षात् सन्मुख आकर कहते थे कि बुढिया भाई तू जो चाहे सो मांग ले| बुढिया कहती है, मुझे मांगना नहीं आता तो कैसे और क्या मांगू| तब गणेश जी बोले कि अपने बहु बेटे से पूछकर मांग ले| तब बुढिया ने अपने पुत्र और वधु से पूछा तो बेटा बोला कि धन मांग ले और बहु ने कहाँ की पोता मांग लें| तब बुढिया ने सोचा कि बेटा यह तो अपने-अपने मतलब की बातें कर रहे है| अतः इस बुढिया ने पड़ोसियों से पूछा तो, पड़ोसियों ने कहा कि बुधिया तेरी थोड़ी सी जिंदगी है| क्यूँ मांगे धन और पोता, तू तो केवल अपने नेत्र मांग ले जिससे तेरी शेष जिंदगी सुख से व्यतीत हो जाए| उस बुढिया ने बेटे और बहु तथा पडौसियों की बातें सुनकर घर में जाकर सोचा, जिसमे बेटा बहु और मेरा सबका ही भला हो वह भी मांग लूँ और अपने मतलब की चीज़ भी मांग लूँ| जब दुसरे दिन श्री गणेश जी आये और बोले, बोल बुढिया क्या मांगती है| हमारा वचन है जो तू मांगेगी सो ही पायेगी| गणेश जी के वचन सुनकर बुढिया बोली, हे गणराज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आँखों में प्रकाश दें, नाती पोते दें, और समस्त परिवार को सुख दें, और अंत में मोक्ष दें| बुढिया की बात सुनकर गणेश जी बोले बुढिया माँ तूने तो मुझे ठग लिया| खैर जो कुछ तूने मांग लिया वह सभी तुझे मिलेगा| यूँ कहकर गणेश जी अंतर्ध्यान हो गये| हे गणेश जी! जैसे बुढिया माँ को मांगे अनुसार आपने सब कुछ दिया वैसे ही सबको देना| और हमको भी देने की कृपा करना|

करवा चौथ का उजमन

उजमन करने के लिए एक थाली में तेरह जगह २ से ४ पूड़ी और थोड़ा सा सीरा रख लें, उसके ऊपर एक साड़ी ब्लाउज और रूपए जितना चाहे रख लें| उस थाली के चारों ओर रोली और चावल से हाथ फेर कर अपनी सासू जी के पांव लगकर उन्हें दे देवें| उसके बाद तेरह ब्राह्मणों को भोजन करावें और दक्षिणा दे कर तथा विन्दी लगाकर उन्हें विदा करें|

Home | About Us | Contact | Sitemap | Feedback
Copyright © Society for the Confluence of Festivals in India (SCFI). All Rights Reserved